ग्रामीण महिला स्वसहायता समूह में कार्यरत् निरक्षर एवं साक्षर महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने एवं नेतृत्व करने की क्षमता के विकास में षिक्षा की भूमिका का अध्ययन (रायपुर जिले के विषेष संदर्भ में

 

डाॅ. देवेन्द्र कुमार1, डाॅ. अब्दुल सत्तार2, श्री गैंद दास मानिकपुरी3

1प्राध्यपाक, कंिलंगा विष्वविद्यालय, नया रायपुर

2विभागाध्यक्ष, कमला नेहरू महाविद्यालय, कोरबा

3सहायक प्राध्यपक, समाधान महाविद्यालय, बेमेतरा

*Corresponding Author E-mail:

 

ABSTRACT:

शिक्षा व्यक्ति के सर्वागिण विकास समाज की चतुर्मुखी उन्नति और सभ्यता की बहुमुखी प्रगति की आधारषिला हैं। षिक्षा को मनुष्य का तीसरा नेत्र माना जाता है। षिक्षा का प्रकाष व्यक्ति के सब शंसयों का उन्मूलन और उनकी सब बाधाओं का निवारण करता है। षिक्षा से प्राप्त अन्र्तदृष्टि व्यक्ति को संपन्न करती है। उनके सुयष, सुख, और समृद्धि में योगदान देती है और उसे भवसागर को पार करके मोक्ष प्राप्ति में सहायता देती है।

 

KEYWORDS:  स्वसहायता समूह, अध्ययन, रायपुर

 

 

 


प्रस्तावना:-

अरस्तु ने ठीक ही कहा है, कि ‘‘मनुष्य एक सामाजिक प्राणी हैं।‘‘ षिक्षा की अभाव में मानव जीवन की कल्पना करना असंभव है। सृष्टि से लेकर अब तक षिक्षा का प्रभाव एवं अस्तित्व भली प्रकार स्वीकार किया जा रहा है। जब तक संसार में मानव का अस्तित्व बना रहेगा, तब तक षिक्षा की प्रक्रिया निरंतर चलती रहेगी। षिक्षा किसी भी राष्ट्र की धुरी है जिस पर उसके विकास का चक्र घूमता है राष्ट्र जनों मानसिक क्षितिज का विस्तार देकर उन्हंे प्र्रत्येक क्षेत्र में कार्य सक्षम बनाना षिक्षा का उपहार है।

 

 

षिक्षा को मानवीय जीवन का ज्योर्तिमय पक्ष माना है,जिससे मानव के व्यक्तित्व का चर्तुमुखी विकास होता है। षिक्षा मानव के बौद्धिक तथा सामाजिक विकास में जन्म से चल रही प्रक्रिया है। मानव जन्म से लेकर मृत्यु तक जो कुछ सीखता है या करता है, वह षिक्षा के माध्यम से ही करता है। प्राचीन काल में षिक्षा को तो पुस्तकीय ज्ञान का पर्यायवाची माना गया और ही जीविकोपार्जन का साधन है,वरन् षिक्षा को वह प्रकाष माना गया है,जो व्यक्ति को उत्तम जीवन व्यतीत करने मोक्ष प्राप्त करने का साधन माना है।

 

किसी भी देष की प्रगति में वहां की स्त्रियों का महत्वपूर्ण योगदान होता है। स्त्री ही ऐसे बालकों के निर्माण में सक्षम होती है, जो देष की प्रगति के पथ पर अग्रसर करने में समर्थ होती है। षिक्षित नारी समूह ही परिवार समाज को सुसंस्कृत बनाती है। इसी कारण मनु ने कहा हैं, कि -‘‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तन्त्र देवता‘‘ अर्थात् जहां नारी की पूजा होती है, वहां ईष्वर निवास करते है। पूजा का अर्थ रोली अक्षत लेकर चढ़ाने से नहीं है बल्कि इसका अर्थ हैं,कि जहाॅं नारी को गौरव दिया जाता है। उसकी षिक्षा की उचित व्यवस्था की जाती है। और उसको समाज के निर्माण में पुरूषों के समान की स्वतंत्रता प्रदान की जाती है, वहांॅ देवता निवास करते है। भारत के बहुमुखी विकास हेतु स्त्रियों को गौरव प्रदान करना चाहिए और स्त्री षिक्षा को अधिक से अधिक प्रसार करने का भी प्रयास किया जाना चाहिए।

 

प्रसिद्ध अर्थषास्त्री अर्मत्य सेन के अनुसार -

‘‘महिला सषक्तिकरण से केवल महिलाओं के जीवन में निष्चित रूप से सकारात्मक असर पड़ेगा बल्कि पुरूषों और बच्चों को भी इसका लाभ मिलेगा।‘‘

 

भारत में रोजगार एंव महिलाओं की स्थिति एक विडम्बना यह हैं कि ग्रामीण क्षेत्रों महिलाऐं जो घरेलू या खेती बाड़ी, पशुपालन, ईधन बटोरने तथा कुटीर उद्योग की गतिविधियों जैसे काम संभालती हैं। उनका आर्थिक मूल्यांकन नहंी होता, उन्हंे रोजगार की श्रेणी में नहीं रखा जाता। गांवों में रोजगार के अवसर अधिक हैं। और वहां की कामकाजी महिलाओं का अनुपात शहर की तुलना में अधिक हैं। गांवों में महिलाओं की रोजगार और उनकी मजदूरी का स्तर अत्यधिक नीचे रहता हैं। अधिकतर औरते अषिक्षित और अकुषल होने के कारण श्रम आधारित कार्य करती हैं। और उन्हे वेतन देने के मामले में भी भेद-भाव बरता जाता हैं।

 

वर्ष 2011 की जनगणना आंकड़ों के अनुसार भारत में महिलाओं की साक्षरता दर 65.46 प्रतिषत हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में स्त्री साक्षरता दर मात्र 46.7 प्रतिषत हैं, जो नगरीय क्षेत्र की स्त्री साक्षारता दर 73.2 प्रतिषत के विरूद्ध काफी असंतोष जनक हैं। कम षिक्षित और अप्रषिक्षित ग्रामीण महिलाओं का भारत में एक विषाल कार्य दल हैं। जिनकों बडे़ सुस्थापित व्यापार प्रतिष्ठानों में काम मिलना कठिन होता हैं। कम गतिषीलता, अप्रषिक्षित कार्य की जटिलता के कारण भी ग्रामीण क्षेत्र की महिलाऐं इन व्यापार प्रतिष्ठानों या उद्योगों में काम नहीं कर पाती हैं। अतः इन महिलाओं को छोटे स्तर पर रोजगार उपलब्ध करने वाले व्यवसायों में भागीदारी करने के लिए स्व-सहायता समूहों की अवधारणा पर बल दिया गया हैं।

 

हस्तषिल्प, हथकरघे का काम, आचार-पापड़ बनाना, राषन दुकान चलाने,कृषि पशु पालन एंव डेयरी चलाने, खाद प्रसंस्करण आदि का संचालन स्व-सहायता समूहोंके द्वारा संभव हो सकता हैं। जहां कई महिलाऐं रोजगार प्राप्त कर अपने उद्यम को लाभप्रद तरीके से चला सकते हैं। विकास कार्यक्रमों में ग्रामीण महिलाओं की प्रत्यक्ष तौर पर भागीदारी उनकी आर्थिक स्थिति सुधारने, उन्हेें आत्म निर्भर बनाने तथा उनकी निजी आवष्यकताओं की पूर्ति हेतु लागू स्व-सहायता समूह की अवधारणा को विकसित हुए। अब एक लंबा समय बीत चुका हैं। केन्द्र सरकार की 1998 में प्रारंभ स्व-षक्ति योजना, स्वयं सिद्धा(इंदिरा महिला योजना तथा महिला समृद्धि योजना को मिलाकर 12 जुलाई 2001 से प्रारंभं) योजना स्वर्ण जयंती, ग्राम स्व-रोजगार योजना आदि के अंतर्गत 18.53 लाख स्व-सहायता समूह गठित किए जा चुके हैं। जिसमें 9.96 लाख समूहों ने ग्रेड-1 और ग्रेड-2 पास कर लिया हैं। वर्ष 2004-05 में इस योजना का बजटीय प्रावधान एक हजार करोड रूप्ये तथा ग्रामीण विकास मंत्रालय ने देष में विभिन्न स्व-सहायता समूह के लिए 150 विषेष परियोजनाऐं मंजूर की हैं।

 

छत्तीसगढ़ राज्य में भी इस योजना के अंतर्गत 16000 स्व-सहायता समूह गठित किए गए हैं। मार्च 2001 तक इन सहायता समूहों में 1,33,61,327 रूप्ये की धनराषि एकत्रित की गई हैं। जिसकी सहायता से महिलाओं के व्यक्तिगत पारिवारिक जीवन की आवष्यकताओं की पूर्ति हुई हैं। विगत 10 वर्षों में पूरे राज्य में लाखों महिलाऐं स्व-सहायता समूह की सदस्य बन चुकी हैं। इन ग्रामीण महिलाओं की आर्थिक सामाजिक सषक्तिकरण में स्व-सहायता समूह का क्या और कितना योगदान हैं तथा ग्रामीण महिलाओं की स्थिति इन समूहों का सदस्य बनने के बाद कितनी परिवर्तित हुई हैं। इसका आंकलन प्रस्तुत अध्ययन किया गया है। जिसके फलस्वरूप ग्रामीण महिला स्वसहायता समूह में कार्यरत् निरक्षर एवं साक्षर महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने एवं नेतृत्व करने की क्षमता के विकास में षिक्षा की भूमिका का अध्ययन से संबंधित विषय का चुनाव किया गया है।

 

स्व-सहायता समूह:-

स्व-सहायता समूह लगभग एक जैसी सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति वाले ऐसे ग्रामीण निर्धनों का एक समूह होता हैं। जो स्वेच्छा से संगठित होते हैं, नियमित रूप से थोड़ी-थोड़ी राषि बचाकर सामूहिक निधि में जमा करते हैं, और इस राषि का उपयोग अपनी आकस्मिक आवष्यकताओं की पूर्ति के लिए आपसी लेन-देन द्वारा करते हैं। समूह के सदस्य हफ्ता-15 दिन अथवा महीने में एक बार बैठक करके उसमें विभिन्न विषयों पर चर्चा कर एक दूसरे की कठिनाई का समाधान ढूढ़ते हैं। बैठक के दौरान ही बचत राषि जमा की जाती है तथा ऋण का लेन-देन किया जाता है।

 

इन स्व-सहायता समूहों द्वारा केवल निजी आवष्यकताओं हेतु ऋण उपलब्ध हो पाता हैं,बल्कि बड़ी संस्थाओं या संसाधनों से ग्रामीण महिलाओं का जुड़ाव होता हैं। सरल दस्तावेज काम कागजी कार्यवाही बिना किसी प्रतिभूति के बैंकों से ऋण उपलब्ध हो जाता हैं। स्वयं नियम बनाने की स्वतंत्रता, आपसी समस्याओं पर चर्चा एवं विचार अभिव्यक्ति के लिए मंच की उपलब्धता आदि अनेक ऐसी सुविधाऐं हैं, जिन्होने ग्रामीण महिलाओं को स्व-सहायता समूह के रूप में संगठित होने के लिए प्रेरित किया हैं।

 

अध्ययन का महत्व:-

शिक्षा के द्वारा ही स्त्री परिवार को स्वर्ग बनाती हैं। स्त्री षिक्षा से संपूर्ण समाज का विकास होता हैं तथा आज के वैज्ञानिक युग में महिलाओं का कार्य क्षेत्र घर या संतान पालन ही नहीं वरन् समाज देष के उत्तर दायित्व पूर्ण कार्यों में साहित्य रूप से भाग लेना भी हैं। भारतीय परंपरा में नारी के इतने रूप बताये गये हैं, परन्तु सच्चाई यह सामने आती हैं, कि पुरूष ने नारी के इन रूपों का सम्मान करके उनकी षिक्षा-दीक्षा की व्यवस्था की हैं और इसका उत्तर स्वयं स्वामी विवेकानंदजी ने बताया हैं, कि ‘‘स्त्रियों को हमेषा असहायता और दूसरों पर दासत्व की षिक्षा दी गई हैं, परन्तु आज समाज के हर क्षेत्र में षिक्षित महिला आन्तरिक एवं बाह्य जगत में प्रवेष कर रहीं हैं।

 

प्रस्तुत विषय शोध का मुख्य उद्देष्य हैं,कि महिलाओं की स्थिति सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति शैक्षिक सामंजस्य के कारण सामान्यतम की स्थिति से भी पिछड़ी हुई हैं। क्यांेकि महिलाओं को सामुदायिक रूप से षिक्षा में महत्व नहीं दिया गया। सामाजिक तौर पर अवधारणाऐं यह हैं, कि महिलाऐं पढ-लिखकर या साक्षर होकर क्या करेगी? बालिका या महिलाऐं जन्म से लेकर मरण तक सामाजिक सद्भावना से चार दीवारी तक ही सीमित रह गई। पुरूष प्रधान होने के कारण महिलाओं में अनेक प्रकार की प्रथा प्रचलित हैं जिनमें महिलाओं की सामाजिक, आर्थिक स्थिति के कारण षिक्षा से वंचित हो गई हैं। सामाजिक मनोवृत्ति प्रभाव से महिलाएं षिक्षा के अभाव में पिछड़ गई हैं। षोध का मुख्य आषय हैं, कि महिला उत्थान सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक समस्या राष्ट्र व्यापी हो गई है।

 

हर क्षेत्र में महिला षिक्षा को महत्व दिया जाना अत्यंत आवष्यक हैं, जिससे उनकी सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक षिक्षा से मजबूत हो सके। महिला देष की भविष्य है, यदि षिक्षा ही पूर्ण नहीं हो पायेगी, तो राष्ट्र विकसित ही नहीं हो पायेगीं महिला षिक्षा ही देष का स्वर्णितम भविष्य हैं।‘‘नारी पढ़ेगी तो विकास गढे़गी।‘‘महिलाओं की सामाजिक एवं आर्थिक विकास में षिक्षा की महत्वपूर्ण भूमिका होती हैं। जिसके फलस्वरूप ग्रामीण महिला स्वसहायता समूह में कार्यरत् निरक्षर एवं साक्षर महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने एवं नेतृत्व करने की क्षमता के विकास में षिक्षा की भूमिका का अध्ययन से संबंधित विषय का चुनाव किया गया। अतः अध्ययन के महत्व को व्यक्त करता हैं।

 

अध्ययन के उद्देष्य:-

षोधकत्र्ता द्वारा ली गई षोध समस्या के अध्ययन हेतु निम्नलिखित उद्देष्यों का निर्माण किया गया हैः

1.     स्वसहायता समूह में कार्यरत् निरक्षर एवं साक्षर महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने में शिक्षा की भूमिका का अध्ययन करना।

2.     स्वसहायता समूह में कार्यरत् निरक्षर एवं साक्षर महिलाओं में नेतृत्व करने की क्षमता के विकास में शिक्षा की भूमिका अध्ययन करना।

अध्ययन की परिकल्पना:-

प्रस्तुत समस्या के अध्ययन हेतु शोधकत्र्ता ने निम्न लिखित परिकल्पनाएँ निर्मित की है -

1.     परिकल्पना एच4 - स्वसहायता समूह में कार्यरत् निरक्षर एवं साक्षर महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने में शिक्षा की भूमिका हो सकती है।

 

2.     परिकल्पना 5 - स्वसहायता समूह में कार्यरत् निरक्षर एवं साक्षर महिलाओं में नेतृत्व करने की क्षमता के विकास में शिक्षा की भूमिका हो सकती है।

 

अध्ययन की परिसीमा:-

प्रस्तुत शोध अध्ययन हेतु अध्ययन हेतु शोधार्थी ने निम्नलिखित परिसीमाएं निर्मित की है -

1.     अध्ययन हेतु रायपुर जिले का चयन किया गया है।

2.     अध्ययन हेतु चयनित रायपुर जिले के अन्तर्गत अभनपुर तहसील का चयन किया गया है।

3.     अध्ययन हेतु चयनित अभनपुर तहसील के कुल दस गाॅवों के ग्रामीण महिला स्व-सहायता समूह में कार्यरत् महिलाओं का चयन किया गया है।

4.     अध्ययन हेतु कुल 600 महिलाओं में से 300 निरक्षर एवं 300 साक्षर महिलाओं का चयन किया गया है।

5.     प्रस्तुंत अध्ययन ग्रामीण महिला स्व-सहायता समूह में कार्यरत् निरक्षर एवं साक्षर महिलाओं के तक सीमित है।

 

संबंधित शोध अध्ययन:-

प्रस्तुत षोध समस्याग्रामीण महिला स्वसहायता समूह में कार्यरत् निरक्षर एवं साक्षर महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने एवं नेतृत्व करने की क्षमता के विकास में षिक्षा की भूमिका का अध्ययन”(रायपुर जिले के विषेष संदर्भ में) के अतंर्गत अधिकांष षोध कार्य विभिन्न राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय षोध सम्मेलनों में प्रस्तुत किए गये षोध पत्र के रूप में ही देखने को मिलता है। षोधार्थी द्वारा जिन षोध साहित्यों की सहायता ली गई है, उनका विवरण निम्नानुसार है -

 

भारत में महिला स्वसहायता समूह से संबंधित षोध अध्ययन:-

कैथरीन (1989) के द्वारा ब्रेक पर किये गये तुलनात्मक अध्ययन में पाया गया कि लघुवित्तीय नीतियां निर्धन महिलाओं के प्रभावी विकास में सहायक होती है एवं सहभागी महिलाओं के प्रभावी विकास में सहायक होती है एवं सहभागी महिलाओं की आय सृजन में वृद्धि कर स्थानीय व्यवस्था को सुदृढ़ बनाकर सशक्तीकरण करते है, यह महिलाओं को गतिशील बनातें है एवं उनका सामाजिक-आर्थिक सशक्तीकरण करते है।

 

जुमानी उषा (1991) सेवा के एक अध्ययन से पता चलता है कि यद्यपि महिलाएं रोजगार के लिए तरह-तरह के कार्य बड़ी महेनत से करती है, फिर भी उस काम से होने वाली आय और मुनाफे को अपने रोजगार में वापस लगाने तथा बाजार की स्थिति का सही अंदाजा होने के कारण हिसाब-किताब में कमजोरी की जो अक्षमताएं होती है, उसके कारण उसका इस राशि पर कोई नियंत्रण नहीं रहता है, तथा उसे महिलाओं को थोड़ी-थोड़ी राशि समय-समय पर उपलब्ध कराते है।

 

खानकर, एस. आर. (1995) जी.बी.बी.आर..सी. और आर.डी.12 के कुल 1798 परिवारों में से जिसमें 1538 परिवार जिसनें ऋण प्राप्त किया 260 जिसने किसी भी तरह का ऋण प्राप्त नहीं किया। के अध्ययन में पाया गया कि पुरूष कर्जदार परिवारों की अपेक्षा महिला ऋण प्राप्तकर्ता परिवारों ने ज्यादा अच्छे जीवन स्तर को प्राप्त किया है।

 

महाजन, वी. (1996) ने वल्र्ड बैंक से प्रायोजित 60 गांव के ग्रामीण निर्धन 300 पुरूष 300 महिलाओं 110 ग्रामीण बैंक के अधिकारियों पर किए अध्ययन में पाया कि निर्धनों के लिए वित्तीय सेवाओं में सुधार की आवश्यकता है, साथ ही पाया गया कि वित्तीय सेवाओं में गरीबों के लिए गैर राजनीतिकरण, स्वामित्व प्रशासनिक कसावट की जरूरत है।

 

नाबार्ड (1997) के अध्ययन में स्वसहायता समूह के विभिन्न सकारात्मक परिणाम नजर आए है - स्वसहायता समूह के ऋण का आकार बढ़ा है।ऋण का उपयोग उत्पादक आय सृजन के कार्य के लिए किया जाता है।समूह के द्वारा एक संयुक्त संपत्ति का निमार्ण कर समूह की आय में वृद्धि की जाती है। समुह में उच्च आय के लिए बेहतर जागरूकता पाई गयी।ऋण अदायगी दर लगभग 100 प्रतिशत पायी गयी है। सामाजिक आर्थिक सशक्तीकरण लगातार बढ़ता पाया गया।

नाबार्ड (2000) नाबार्ड के द्वारा पहली बार एक बड़े पैमाने पर स्वसहायता समूह के प्रभाव का अध्ययन किया जिसमें 11 राज्यों के 223 एस.एच. जीएस. को चुना गया,उसके 560 सदस्यों का 243 साक्षरकर्ताओं द्वारा अध्ययन करने पर पाया कि समूह के गठन के समय कुल संेपल के 42 प्रतिशत सदस्य बी.पी.एल. में थे, जो घटकर 22 प्रतिशत रह गए, 30 साल के भीतर 70 प्रतिशत से ज्यादा ने सम्पत्ति में 70 प्रतिशत की वृद्धि पायी गयी, रोजगार के अवसर 18 प्रतिशत से बढ़कर 21 प्रतिशत हो गए, वार्षिक बचत तिगुनी पाई गई, खरीद की क्षमता दुगुनी हो गयी तथा उपभोग 24 प्रतिशत बढ़ गया और महिलाओं के आत्मविश्वास में वृद्धि, स्वास्थ्य सफाई शौच सुविधाओं में वृद्धि सामाजिक समस्याओं में कमी, घरेलू हिसां में कमी पायी गयी, पारिवारिक निर्णय में महत्वपूर्ण भूमिका वाक्कला में वृद्धि पायी गयी,17 प्रतिशत रोजगार में वृद्धि, 30 प्रतिशत परिवार की आय में वृद्धि, 72 प्रतिशत सम्पत्ति में वृद्धि बचत में 200 प्रतिशत की वृद्धि पायी गयी।

 

क्राॅप एवं सुरन (2002) ने अपने अध्ययन में स्वसहायता समूह की उपलब्धियों के 10 महत्वपूर्ण तथ्यों को पाया जो निम्नकिंत है - लगातार समय अतंराल पर छोटी स्थायी बचत समूहों में सदस्यों का स्वंय के द्वारा चुनाव।पहले बचत बाद में उधार। समूह के द्वारा निरीक्षण महिलाओं पर केन्द्रित। समझदारी से उधार देना। ऋण अदायगी का कम समय।बाजार की दर से कम दर पर ब्याज।क्रमिक उधार पद्धिति।कार्यक्रम में पारदर्शिता साथ ही अध्ययन से यह भी पता चला कि एस.एच.जी.एस. बैंकिग व्यवस्था का एक आदर्श जोड़ है, जिससेे गरीबों के साथ बैंक जैसी अवधारणाएं भलीभूत हुए। पूंजी प्रवाह परिवार में बढ़ा साथ ही इस अध्ययन से यह दृष्टिगोचर होता है कि लघुवित्त का महिलाकरण हो गया है।

 

हासकर, राव एवं छाया (2005) ने उड़ीसा, झारखंड छत्तीसगढ़ पूर्वी राज्यों के 115 एस.एच.जी.एस. सदस्य के 60 समूहों का अध्ययन करने पर पाया कि 30 प्रतिशत परिवार में एस.एच.जी.एस.में आने के बाद उनकी सम्पत्ति में वृद्धि हुई। औसत बचत 952 रू.से बढ़कर 1863 हो गयी कुल आय में 23 प्रतिशत वृद्धि हुई है। साथ ही कार्यक्रम की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि सामाजिक, सशक्तीकरण रही एस.एच.जी.एस. सदस्यों में आत्मविश्वास का संचार, निणर्य में महत्वपूर्ण भूमिका वाक कला में वृद्धि पायी गयी है। 17 प्रतिशत रोजगार में वृद्धि, 30 प्रतिशत परिवार की आय में वृद्धि, 72 प्रतिशत सम्पत्ति में वृद्धि एवं बचत में 200 प्रतिशत की वृद्धि अध्ययन में पायी गयी है।

 

श्रीवास्तव, अल्का (2006) के छत्तीसगढ़, उत्तरप्रदेश, बिहार के तीन-तीन जिलों के 50 एस.एच.जी.एस. के पाॅच सदस्यों के अध्ययन में पता चला है कि स्वसहायता समूह के सदस्यों पर सामाजिक आर्थिक प्रभाव पड़ता है। बैंको को लाभ प्राप्त होता है। गरीब सदस्यों को आर्थिक लाभ प्राप्त होता है, अतः एस.एच.जी.एस. बैंक लिंकेज कार्यक्रम गरीबों के लिए एक प्रभावशाली माध्यम है।

 

मैरी, सोमनाथ, रोहिनी एवं लोरे (2007) ने उड़ीसा के दो जिले क्योंझर मयूरभंज एवं .. के रायगढ़ जिले में अध्ययन करने पर पाया कि स्वसहायता समूह एक असफल कार्यक्रम हैं। 1998-2006 तक मात्र 107 समूह ही क्रियाशील रहे। केवल 20 प्रतिशत महिलाएं ही लगातार समूह में बनी रही।

 

सुप्रिया (2008) ने आंध्रप्रदेश के मेहबूग नगर जिले के वेपूर और गुड़ी मलकपुरा गांव के 29 विवाहित जोड़े जिसमें 117 एस.एच.जीएस. के सदस्य थे, जिन्होनें कम से कम एक बार ऋण लिया था के अध्ययन करने पर यह पाया कि कार्यक्रम का विस्तार हो रहा है। किंतु महिलाओं का वित्त पर नियंत्रण अल्प है महिला सशक्तीकरण अपेक्षित स्तर पर नहीं है। किन्तु परिवार को आर्थिक स्तर में सुधार आया है संपत्ति में थोड़ी वृद्धि हुई हैं।

 

पी. के. अवस्थी, दीपक राठी और विमला साहू ने अपने अध्ययन में 70 समूह सदस्यों का चुनाव कर अध्ययन किया। इस अध्ययन से यह ज्ञात हुआ कि स्व सहायता समूह के गठन के बाद महिलाओं ने बचत ऋण संबंधी कार्य किया और विकास प्रक्रिया में हिस्सेदारी भी की। लेकिन सदस्यों को प्रोत्साहन में कमी, अधोसंरचना में कमी,नियमित माॅनीटरिंग और फाॅलोअप में कमी के कारण उन्होंने हानि उठानी पड़ी। इस अध्ययन से यह संकेत मिलता है, कि स्व सहायता समूहों की प्रगति का वार्षिक मूल्यांकन आवष्यक है।

नाबार्ड (2000) नाबार्ड के द्वारा पहली बार एक बड़े पैमाने पर स्वसहायता समूह के प्रभाव का अध्ययन किया जिसमें 11 राज्यों के 223 एस.एच. जीएस. को चुना गया उसके 560 सदस्यों का 243 साक्षारकर्ताओं द्वारा अध्ययन करने पर पाया कि समूह के गठन के समय कुल संेपल के 42 प्रतिषत सदस्य बीपीएल में थे जो घटकर 22 प्रतिषत रह गए 30 साल के भीतर 70 प्रतिषत से ज्यादा ने सम्पत्ति में 70 की वृद्धि पायी गयी रोजगार के अवसर 18 प्रतिषत से बढ़कर 21 प्रतिषत हो गए वार्षिक बचत तिगुनी पाई गई ,खरीद की क्षमता दुगुनी हो गयी तथा उपभोग 24 प्रतिषत बढ़ गया और महिलाओं के आत्मविश्वास में वृद्धि ,स्वास्थ्य सफाई शौच सुविधाओं में वृद्धि सामाजिक समस्याओं में कमी ,घरेलू हिसां में कमी पायी गयी ,पारिवारिक निर्णय में महत्वपूर्ण भूमिका वाककला में वृद्धि पायी गयी 17 प्रतिषत रोजगार में वृद्धि 30 प्रतिषत परिवार की आय में वृद्धि 72 प्रतिषत सम्पत्ति में वृद्धि बचत में 200 प्रतिषत की वृद्धि पायी गयी।

 

के.के. जैन (2010) हरियाणा उड़ीसा राज्य के दो जिले करनाल जगतसिंगपुर के स्वसहायता समूह के प्रषासन संचालन के प्रभावी तत्वों का एवं लघुवित्तीय कार्यक्रमों के उपलब्धियों का अध्ययन किया एवं बताया कि स्वसहायता समूहों के संचालन के लिए एकीकृत नीति बनाने की आवष्यकता है।

 

विदेशांे में महिला स्वसहायता समूह से संबंधित शोध अध्ययन:-

रहमान (1986) के अनुसार-बांग्लादेश के ग्रामीण बैंक के महिला कर्जदारों पुरूष कर्जदारों जिसमें 80 प्रतिशत महिला कर्जदार थी के तुलनात्मक अध्ययन में पाया कि 75 प्रतिशत महिला उधारकर्ता अपने ऋण का उपयोग स्वंय करती है और सामान्यतौर पर उनके परिवार की आय जो कर्जदार महिलाएं नहीं है, से ज्यादा होती है। साथ ही उन्होनें अपने अध्ययन में यह भी पाया कि जो महिलाएं सक्रिय कर्जदार ज्यादा है, उनका उपभोग का स्तर जो महिलाएं ऋण का उपयोग नहीं करती से ज्यादा होती है।

 

हासमी (1994) ने बांग्लादेश के ग्रामीण बैंक के महिला सदस्य गैर जी.बी. महिलाओं का तुलनात्मक अध्ययन करने पर पाया गया कि ग्रामीण बैंक की महिलाएं परिवार में ज्यादा प्रभावी आर्थिक भूमिका का निर्वहन करती है परिवार में उनका आर्थिक सहयोग ज्यादा बेहतर होता है। ऋण से महिलाओं का प्रभावी सशक्तीकरण होता है।

 

अक्रेली (1995) ने बांग्लादेश में तीन वित्तीय संस्थानों ब्रैंक.जी.बी. और सेव बच्चे के 856 कर्जदारों का अध्ययन किया जिसमें 613 महिला उधारकर्ता के अध्ययन में पाया गया कि ऋण से महिलाओं के जीवन में बहुत थोड़ा सुधार आता है, वही महिलाएं ऋण का अधिकतर भाग अपने पति या घर के मुखिया को सौप देती है महिलाओं के कार्यभार में वृद्धि होती है पति के हिंसक व्यवहार में वृद्धि होती है।

 

हासमी एवं रीले (1996) ने ग्रामीण बैक की विवाहित महिलाओं के अध्ययन में पाया कि गांव में वे महिलाएं जिन्होनें ऋण लिया है उन महिलाओं की अपेक्षा ज्यादा सशक्त है, जिन्होनें ऋण प्राप्त नहीं किया है। उन्होनें सशक्तीकरण के प्रभावी संकेतक गतिशीलता खरीदी, ब्रिक्री, परिवार में निर्णय की स्वतंत्रता, राजनैतिक जागरूकता, सामाजिक प्रचार -प्रसार, नेतृत्व आदि से महिला सशक्तीकरण को मापा पाया कि परिवार के आय में वृद्धि होती है वे महिलाएं जिन्होनें ऋण नहीं लिया है, वे सशक्तीकरण माप में कम स्कोर करती है।

 

लिण्डा (1997) के आनुभाविक अध्ययन के आधार पर महिला सशक्तीकरण की परियोजना के लघुवित्तीय कार्यक्रमों से निम्नाकिंत नतीजे निकलकर आते है -महिलाओं के द्वारा लिए गए ऋण पर उसके नियंत्रण विभिन्न वित्तीय आंकड़ों, वित्तीय सेवाओं उद्यम की उपलब्धियों की जानकारी प्राप्त नहीं होती है।आर्थिक गतिविधियों का परिवार में प्रभाव आय में वृद्धि की भी जानकारी प्राप्त नहीं होती है।आय में कुछ वृद्धि अवष्य दिखायी देती है किन्तु राजनीतिक सामाजिक सषक्तीकरण नहीं दिखायी देता है।

 

कबीर नैला (1998) ने बांग्लादेश के दो जिले फरीदपुर मेमनसिंग के 305 391 महिला सदस्यों के अध्ययन करने पर पाया कि महिला सशक्तीकरण एक बहुआयामी अवधारणा है, इसे किसी एक संकेतक से नहीं मापा जा सकता अध्ययन से यह भी स्पष्ट हुआ कि लघुवित्तीय कार्यक्रम से महिलाओं का कल्याण विकास होता है।

अब्बास (2001) ने बैंक, आई.सी.डी.डी.आर.बी. बांग्लादेश के संयुक्त शोध में 14 गांवो के अध्ययन करने पर पाया कि महिलाएं जब अपने पांरपरिक घेरलू कार्यो से आय सृजन के लिए कार्य करती है तब उनमें चिंता तनाव पैदा होता है। यह भी पाया गया कि निर्धन महिलाएं जो ऋण लेती है उनमें भी चिंता तनाव पाया जाता है।

 

रूबीना (2007) ने बांग्लादेष के लघुवित्तीय कार्यक्रमों के अध्ययन में पाया कि एम.एफ.आई के द्वारा आय में वृद्धि होती है, उपभोग स्तर बढ़ता है। आय में असमानता घटती है मानवीय कल्याण में सहायक होता हैै। अतः लघुवित्तीय कार्यक्रम संस्थाए गरीबी उन्मूलन में विकास की एक महत्वपूर्ण नीति है। जिसके माध्यम से सहस्त्राब्दी के विकास लक्ष्य पूरा किया जा सकता है।

 

फ्रीमेन एवं नेसी (2008) ने अपने षोध में बताया है कि लघुवित्तीय सेवाएं या कार्यक्रम अपनी लक्ष्य की प्राप्त करने में पीछे क्यों है? विशेष तौर पर विकासशील देशों महिलाओं के विकास में पायी जाने वाले विसंगतियों को स्पष्ट किया लघुवित्तीय नीतियों में विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम स्थानीय संस्थाओं के साथ मिलकर कार्य करने का सिर्फ महिलाओं की समूह आधारित ही नहीं वरन उन्हें व्यक्तिगत ऋण भी दिया जाए महिलाओं को विशेष सेवाएं परामर्ष पर भी बल दिया गया शिक्षा सहयोगी सेवाओं का उन्नत बनाया जाने की आवश्यकताओं को बताया है।

 

समस्या का कथन:-

प्रस्तुत अध्ययन हेतु षोधकर्ता ने इस समस्या का चयन किया है - “ग्रामीण महिला स्वसहायता समूह में कार्यरत् निरक्षर एवं साक्षर महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने एवं नेतृत्व करने की क्षमता के विकास में षिक्षा की भूमिका का अध्ययन”(रायपुर जिले के विषेष संदर्भ में)

 

षोध प्रविधि:-

प्रस्तुत शोध प्रबंध के अध्ययन हेतु शोध विधि के रूप में वर्णनात्मक सर्वेक्षण विधि ;क्मेबतपचजपअम ैनतअमल डमजीवकद्ध का उपयोग किया गया है।

 

 

 

जनसंख्या: -

षोध में जनसंख्या षब्द का अर्थ भिन्न होता है,जनसंख्या का तात्पर्य सम्पूर्ण इकाइयों के निरीक्षण से होता है। इसमें कुछ इकाईयों का चयन करके न्यादर्ष बनाया जाता है। न्यादर्ष की इकाईयों के निरीक्षण तथा मापन से जनसंख्या की विषेषताओं के संबंध में अनुमान लगाया जाता है। षोध की जनसंख्या मेें एक विषिष्ट समूह के समस्त व्यक्तियों को सम्मिलित किया जाता है। प्रस्तुत षोध प्रबंध में जनसंख्या के अंर्तगत अभनपुर तहसील के ग्रामीण महिला स्वसहायता समूह में कार्यरत् निरक्षर एवं साक्षर महिलाओं को लिया गया है। जनसंख्या के अंर्तगत अभनपुर तहसील के अतंर्गत कुल दस ग्राम पंचायत में गठित ग्रामीण महिला स्वसहायता समूह में कार्यरत् महिलाओं की कुल संख्या 3771 को षामिल किया गया है।

 

न्यादर्श:-

प्रस्तुत षोध अध्ययन में द्वितीयक समंकों के साथ-साथ प्राथमिक समंको का उपयोग मुख्य रूप से किया गया है। प्राथमिक समंकों के लिये सोद्देष्य न्यादर्ष पद्धति के माध्यम से अभनपुर तहसील के 93 ग्राम पंचायतों में से दस गाॅवों में ग्रामीण महिला स्वसहायता समूह में कार्यरत् महिलाओं की संख्या अधिक है, जिनका प्रतिदर्ष के रूप मंे चयन किया गया है और इन दस गाॅवों में ग्रामीण महिला स्वसहायता समूह में कार्यरत् महिलाओं की संख्या 600 है,जिनका चयन प्रस्तुत षोध प्रबंध में प्रतिदर्ष के रूप मंे किया गया है।

 

उपकरण:-

प्रस्तुत षोध प्रबंध में प्रदत्तों के संकलन के लिये स्वनिर्मित साक्षात्कार अनुसूची का प्रयोग किया गया है।

 

सांख्यिकीय विष्लेषण:-

प्रस्तुत षोध प्रबंध के अध्ययन में प्रतिषत विधि का प्रयोग समीक्षात्मक अध्ययन के लिए किया गया। ग्रामीण महिला स्वसहायता समूह में कार्यरत् निरक्षर एवं साक्षर महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने एवं नेतृत्व करने की क्षमता के विकास में षिक्षा की भूमिका का अध्ययन (रायपुर जिले के विषेष संदर्भ में) करने के लिए स्वनिर्मित साक्षात्कार अनुसूची का निर्माण किया गया है, जिसमें अधिकतर (हां/नहीं) वस्तुनिष्ठ प्रष्न हैं। इसके लिए संकलित प्रदत्तों को सारणीकृत किया गया और प्रदत्तों द्वारा प्राप्त आंकड़ों का योग कर प्रतिषत एवं ग्रामीण महिला स्वसहायता समूह में कार्यरत् निरक्षर एवं साक्षर महिलाओं के लिए प्रतिषत एवं टी-टेस्ट निकाला गया है।

 

निष्कर्ष:-

1. परिकल्पना प्रथम के अनुसार ग्रामीण स्वसहायता समूह में कार्यरत् निरक्षर एवं साक्षर महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने में शिक्षा की भूमिका से संबंधित विवरण से यह स्पष्ट होता है कि गांव में षतप्रतिषत निरक्षर एवं साक्षर महिला स्वसहायता समूह गठन किया गया हैं। षतप्रतिषत निरक्षर एवं साक्षर उत्तरदाता स्व-सहायता समूह से जुड़े हैंै।षतप्रमिषत उत्तरदाता स्व-सहायता समूह या संस्था से कोई राषि उधार लिये है एवं उनकों ऋण में कोई सब्सिडी दी गई हैं। षतप्रतिषत निरक्षर एवं साक्षर उत्तरदाता का स्वयं का व्यवसाय है एवं अपनी स्वयं के व्यवसाय खुष हैं। इसी प्रकार षतप्रतिषत निरक्षर एवं साक्षर उत्तरदाता स्वयं के व्यवसाय के आय में वृद्धि होने से आपका जीवन स्तर बेहतर एवं आय में वृद्धि होने के पश्चात आपने आवष्यकतानुसार भौतिक वस्तुओं का संग्रह किया हैं। षतप्रतिषत निरक्षर एवं साक्षर महिलाए लिए गए ऋण से मुक्त हो चुके हैं।इस प्रकार स्वसहायता समूह में कार्यरत् निरक्षर एवं साक्षर महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने में शिक्षा की भूमिका महत्तवपूर्ण है। अतः परिकल्पना की पुष्टि होती हैं।

 

2. परिकल्पना द्वितीय के अनुसार स्वसहायता समूह में कार्यरत् निरक्षर एवं साक्षर महिलाओं में नेतृत्व करने की क्षमता के विकास में शिक्षा की भूमिका से संबंधित विवरण से स्पष्ट है,कि षतप्रतिषत निरक्षर एवं साक्षर महिलाए अध्यक्ष,उपाध्यक्ष,सचिव,सदस्य ग्रामीण स्व-सहायता समूह के पद पर कार्यरत् है। 29 प्रतिषत निरक्षर एवं 68.33 प्रतिषत साक्षर महिलाए नेतृत्व करने में रूचि रखते हैं। 35.66 प्रतिषत निरक्षर एवं 72.66 प्रतिषत साक्षर महिलाए स्व-सहायता समूह के द्वारा ग्रामीण महिलाओं में नेतृत्व करने की क्षमता के विकास के लिए प्रयास किया गया हैं। षतप्रतिषत निरक्षर एवं साक्षर महिलाए स्व-सहायता समूह के द्वारा गांव की महिलाओं को संगठित करने का प्रयास किया है। 29 प्रतिषत निरक्षर एवं 68.33 साक्षर महिलाए अनुपस्थिति में समूह की अन्य महिलाऐं नेतृत्व का कार्य करती हैं। उसी प्रकार 56.6 प्रतिषत निरक्षर एवं 79 प्रतिषत साक्षर महिलाए स्व-सहायता समूह के द्वारा ग्रामीण महिलाओं में नेतृत्व करने की क्षमता का विकास हुआ हैं। अतः कहा जा सकता है, स्वसहायता समूह में कार्यरत् निरक्षर एवं साक्षर महिलाओं में नेतृत्व करने की क्षमता के विकास में शिक्षा की भूमिका महत्तवपूर्ण है। अतः परिकल्पना की पुष्टि होती है।

 

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Received on 17.11.2020            Modified on 13.12.2020

Accepted on 27.12.2020            © A&V Publications All right reserved

Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2020; 8(4):279-287.